मनुष्य सामान्यतः स्वयं को ही नही जानता है।

मनुष्य सामान्यतः स्वयं को नही जानता है, मनुष्य नहीं जानता है कि मूलतः वो कौन है अर्थात वह नही जानता कि स्वभावतः वह दुनिया में किसी परिस्थितिवश किस तरह का व्यवहार करेगा।

इसी तरह मनुष्य नहीं जानता कि किसी तरह के निश्चित भाव या संवेदनाएं उसके मनोमय कोश से कभी कहीं क्यों गुजरते हैं, किसी निश्चित या सुनिश्चित तरह के विचार या कल्पनाओं का साक्षी उसे क्यों होना पड़ता है? क्यों व्यक्ति किसी तरह की निर्णय प्रक्रियाओं से गुजरता है, क्यों किसी एक तरह या प्रतिरूपण निर्णयों को वो बार बार प्राप्त होता है? मनुष्य मूल रूप से स्वयं के लिए भी एक रहस्य के समान स्वयं को बना हुआ पाता है। इसी क्रम में व्यक्ति से आगे परिवार निकट संबंधी एवं अपने करीब या आस पड़ोस के वातावरण के बारे में भी इसी तरह का मुगालता बना रहता है कि वो उनमे से बहुत से व्यक्तियों या वस्तु परिस्थितियों का भली प्रकार से अंदाज़ा लगा सकता है, किन्तु अधिकांशतः ऐसा नही होता और वो वहाँ भी स्वयं को भ्रमित ही पाता है और सामान्यतः अपने ही मनोभावों को उनपर आरोपित करने के इलावा उसके समक्ष और कुछ ऐसा नही होता जिससे वो पूर्णरुपेण ये दावा कर सके के वो अपने आस पास के वातावरण या व्यक्ति वस्तु परिस्तिथियों को ऐसे जान पाया है जैसे वो मूल रूप से व्यवहार करने को बाध्य हैं। मनुष्य आमतौर से अपने ही दिमाग या मनोमय कोश में स्वयं को कैद पाता है, वो उन लोगों के मूल स्वभाव को नही जान पाता है जिनके साथ उसका वास्ता पड़ता है। इसी तरह अपने निकट संबंधियों और आस पड़ोस से आगे जब वो किसी दूसरे अपरिचित माहौल में स्वयं को पाता है, तो वो वहाँ के लोगों की एक भिन्न तरह की भाषा शैली या संस्कृति को समझने के साथ ही उनमे से अधिकांश लोगों के मूल स्वभाव को जानने की एक उत्कंठा स्वयं मे पाता है, किन्तु केवल उत्कंठा या जिज्ञासा मात्र से भी वो नए वातावरण को सही तरह से डिकोड कर पाने में सामान्यतः स्वयं को असमर्थ ही पाता है। क्योंकि मनुष्य आमतौर से स्वयं को ऐसे ही हालातों या माहौल में स्वयं को बार बार पाता है जहां वो  ये नही समझ पाता है कि क्यों उसके निर्णय वातावरण या वस्तु परिस्थितियों से भिन्न प्रकट हो जाते हैं या वो निर्णय प्रक्रिया में भूलें कर बैठता है।

कुलमिलाकर मनुष्य बाहरी आवरण या बाहरी जानकारी के अनुसार अपनी निर्णय प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देने की जल्दी कर ही बैठता है और इस तीव्रता के कारण प्रकट होती हैं नयी वस्तु परिस्थितियाँ जिनसे न केवल वह स्वयं प्रभावित होने के लिए अभिशप्त है बल्कि कई बार भविष्य में पड़ने वाले इन संभावित प्रभावों का दायरा या विस्तार मनुष्य की चिर परिचित वस्तु परिस्थितियों या व्यक्तियों की संक्षिप्त दुनिया से बहुत व्यापक हो जाता है। ऐसे में नित नए हालातों या नित नयी होती दुनिया में किसी व्यक्ति के मूल स्वभाव या संभावित मूल स्वभाव को जानने से मनुष्य की निर्णय प्रक्रियाओं में यदि सभी नही तो बहुत सी भूलों से बचा जा सकता है, और यदि कोई सामान्य गलती करने वाले व्यक्ति के सामान्य दिन दैन्य में केवल संभावित भूलों को कम ही किया जा सके तो ये न केवल उस व्यक्ति के लिए अपितु किन्ही परिस्थितियों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले व्यक्तियों के माध्यम से बहुत व्यपाक स्तर पर किन्ही अति सामान्य भूलों या चूकों की प्रभाव क्षमता से उपजने वाले संभावित संकटों से बचा जा सकता है।

स्मरण रहे एक लेखक के रूप में इस लेख को लिखते हुए भविष्य में सूचना प्रौद्योगिकी से उपजने वाली लगभग सभी तरह लाभ हानियों को समेटते हुए इस लेख को साकार रूप दिया जा रहा है, अर्थात इस लेख को लिखते हुए “ऐ आई, ए आर, वी आर, आदि”(#Ai, #Ar #Vr etc) की सीमाओं में होने वाली भूलों को भी इसमे समेट लिया गया है। एवं इस लेख को पढ़ने वाले स्वयं को इस भ्रम से अवश्य बचाएं कि वो व्यक्ति के मूल स्वभाव एवं वस्तु परिस्थितियों को जानने से जुड़ी जिज्ञासाओं को केवल किसी प्रौद्योगिकी की सहायता से ऐसे हल कर पाने मे सक्षम होंगे कि व्यापक स्तर पर किन्ही भूलों के प्रसार या प्रभाव को रोका जा सके, नही ऐसा नही है! अपितु इन प्रोद्योगिकीयों के कारण किन्ही सामान्य भूलों की तीव्रता में केवल गुणात्मक वृद्धि को ही सभी पक्ष महसूस करेंगे। ऐसे में मूल स्वभाव को जानने वाले रहस्यमयी अनुसंधान एवं ज्योतिष आदि  की सीमाओं में आने वाले ज्ञान की आवश्यकता को भविष्य में भी नकारा नही जा सकता है।

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