व्यक्ति, व्यक्तिगत अनुभव और व्यक्तित्व

व्यक्तिगत अनुभव और व्यक्तित्व

व्यक्ति, व्यक्तित्व ‘व्यक्तिगत अनुभव’ दर्शन और ज्योतिष की भी केंद्रीय विषय वस्तु हैं हालांकि ये आत्मनिष्ठ प्रश्न हैं किन्तु फिर भी अधिकांशतः ये दर्शन मे समेकित वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की शृंखला मे ही आते हैं।
व्यक्ति की संकल्पना मे बहुत अर्थछटाएं है, साधारणतः व्यक्ति से हमारा तात्पर्य दृष्टिगत या निश्चित व्यक्तिपरक या निश्चित व्यक्तिवादी होने जैसा ही होता है, जिसकी अपनी जैविक अवधारणाएं एवं विशेषताएं, अपने बाह्य लक्षण, अपना आत्मिक या व्यक्तिगत जीवन, जिसका समष्टि समाज मे अपना ही एक विशिष्ट जीवनपथ भी है। जब बात जीवनपथ या व्यक्ति के जीवन मार्गो की आती है तो उसमे ज्योतिष एवं दर्शनविदों की रुचि आबद्ध या निहित होगी ही, ऐसे मे उन्हे अपने अपने शब्दों मे एवं पहले से चली आ रही तमाम तरह की परिपाटियों को समझते हुए प्रत्येक विशिष्ट व्यक्ति, व्यक्तित्व, और उनके ‘व्यक्तिगत अनुभव’ भी अपने साहित्य एवं दस्तावेज़ों मे सहेजने ही होंगे, इस प्रकार तमाम तरह के व्यक्तिगत अनुभवों और व्यक्ति को सुलभ हुए बिंबों से और उनकी व्याख्या कर पाने मे सक्षम होने से ही दार्शनिक साहित्य का निर्माण होता रहता है, इसी तरह ज्योतिष मे भी पहले से उपलब्ध प्रतिमानों एवं परिपाटियों मे नए उपलब्ध व्यक्तित्व व्यक्तिगत अनुभवों एवं उनके बिंबों की उनके द्वारा की गयी एवं उनके बारे मे समष्टि मे उपलब्ध अनन्य व्याख्याओं को भी ज्योतिषविदों को अपने नए प्रकाशित होते दस्तावेजों मे दर्ज़ करना ही होता है, अन्यथा विषय किसी प्राचीन कूप की भांति प्रयोग मे न होने के कारण एक स्मृतिचिन्ह की भांति केवल ऐतिहासिक दस्तावेज़ सा हो जाएगा। अर्थात ये दोनों ही विषय व्यक्ति एवं विस्तीर्ण व्यक्तिगत अनुभवों की समेकित संभावनाओं को लिए अपने विशिष्ट प्रगति पथों पर सतत बढ़ते रहते हैं। व्यक्ति के अनुभव बेहद निजी होने के साथ कुछ ऐसे प्रतिमान लिए हुए भी होते हैं जों तमाम दूसरे व्यक्तियों से समानता लिए हुए हो सकते हों, और समानता की संभावना लिए ये प्रतिमान जिन दस्तावेजों या साहित्यिक रचनाओं मे भी होते हैं वो उस विशिष्ट तरह के चिंतन और अनुभवों की समानता लिए हुए व्यक्ति को रुचिकर एवं अवश्यंभावी सत्य की प्रतीति लिए हुए हो सकते हैं, और इस तरह रुचि के आधार पर व्यक्ति स्वयं को दूसरे व्यक्तिगत अनुभवों के साथ या समष्टि बिंबों के एक अपने जैसे प्रतीत होते हुए हिस्से या स्वयं को प्रीतिकर समाज से जुड़ा हुआ पाता है।

अभी ये लेख अपूर्ण है।

दर्शन की ‘सात्यता’ (Continuum philosophies)

दर्शन की ‘सात्यता’ (Continuum philosophies)

(सातत्य एक ऐसी चीज़ है जो चलती रहती है, समय के साथ धीरे-धीरे बदलती रहती है, सतत वस्‍तु शृंखला)

हो सकता है, आप किसी ऐसे राज्य या देश काल परिस्थितियों मे केवल एक नागरिक की भांति अपने आस पास की चीज़ों, संभावनाओं या वस्तुगत परिस्थितियों को नेविगेट या स्वयं को जीवन के मार्गों मे मार्ग भ्रमित होने से बचने का प्रयास कर रहे हों, परिस्थिति चाहे कुछ भी हो, आपका सामना किसी न किसी दर्शन या अन्य शब्दों मे दुनिया मे मौजूद किसी न किसी अवरोध, प्रतिरोध, या गतिरोध से होगा ही होगा, इसके उपरांत ही आप किसी निर्णय पर पहुंचेंगे, और जिस किसी निर्णय पर भी पहुंचेंगे वो किसी न किसी बहुत वृहद, कई दफ़े विस्तीर्ण दर्शन या मत से प्रभावित होकर ही तो गुजरेंगे ऐसे मे क्या आप कभी भी किसी ऐसे निर्णय पर पहुँच सकते हैं, जो बेहद सटीक या सबसे सही हो जिसके उपरांत कभी कोई गतिरोध अवरोध आदि अनादि इत्यादि से आपका सामना ही न हो, क्या कभी ऐसा हो सकता है? क्या कभी किसी के भी साथ ऐसा हुआ है?  क्या अब तक हुए किसी वैज्ञानिक, चिंतक, दार्शनिक या तमाम महत्वपूर्ण विषय विशेषज्ञों के साथ ऐसा हुआ है के वो अपने चिंतन या अपने विषय की महारत मे इतना आगे पहुँच गए हों के उनके द्वारा प्रतिपादित तथाकथित सत्य की कोई भी आलोचना या प्रतिरोध हुआ ही न हो और उनके उस श्रेष्ठतम सत्य को शत प्रतिशत उनके ही कुलीन बौद्धिक समुदायों मे अंतिम सत्य के रूप मे स्वीकार कर लिया गया हो, संभवतः ऐसा अभी तक तो नही हुआ होगा और यदि कभी ऐसा हुआ भी हो तो वैसा समुदाय, वो स्वीकार्यता की जानकारी सूचनाएँ अब शायद विलुप्त या विलुप्तप्रायः हो चुकी हैं, अर्थात दर्शन की सात्यता का मूल प्रश्न अभी जस का तस वृहद ब्रह्माण्ड चिंतन प्रश्नों को रचते हुए अपनी विस्तीर्णता मे आगे ही आगे बढ़ता जा रहा है। ऐसे मे एक दर्शन के विद्यार्थी एवं ज्योतिष अनुसंधानकर्ता होने के कारण हम कभी भी ये स्वीकार नही कर सकते के कोई दर्शन सर्वश्रेष्ठ या सर्वमान्य हो चुका है या हो रहा है, इसी क्रम मे किसी राज्य या देश काल परिस्थितियों मे पाए जाने वाले सभी नेतृत्व या राजनैतिक दर्शन भी समाते हैं अन्य शब्दों मे कोई भी राजनैतिक दर्शन केवल अन्य किसी सात्यता लिए हुए एक  वृहद दर्शन की छत्रछाया मे समाया हुआ एक वैधानिक ज्ञान एवं अनुसंधान प्र्कल्प मात्र ही तो है।

अब क्योंकि ये दर्शन भी अंतिम सत्य नही होते इसलिए ये किसी भी राज्य के अंतिम विधान या संविधान को पूर्ण रुपेण अपनी ही एक राजनैतिक दृष्टि की सीमाओं मे न तो बांध सकते हैं न ही उसे अपने घोषणा पत्र या मुख पत्रों से पूर्ण रुपेण परिवर्तित ही कर सकते हैं, दुनियाभर मे कोई भी राज्य चाहे कितना ही एक दर्शन के अधीन स्वयं को पाता हो, किन्तु कूटनीति या अंतराष्ट्रीय संबंद्धों की दृष्टियों मे उसे अन्य दर्शनों को भी न्यूनाधिक स्वीकृति प्रदान करनी ही पड़ती है। 

अर्थात यदि आप किसी भी कारण से किसी दर्शन के अतिरेक को अपने निज धर्म या ज्ञान की सीमाओं मे स्वीकारना नही चाहते हैं तो आप दुनिया भर मे कहीं भी स्वतंत्र हैं, किन्तु अंतर केवल आपके अस्वीकार्यता या विचित्रता के प्रति अन्य विचारों के द्वारा आने वाले अवरोध प्रतिरोध की तीव्रताओं और उन्हे उस राज्य मे प्राप्त अनियंत्रित शक्ति का ही होगा, अर्थात आपका दर्शन शक्ति संतुलन के आभाव मे अशक्त महसूस कर सकता है किन्तु ऐसा बिल्कुल भी नही है कि जो आपका पसंदीदा या जो दर्शन आपको प्रिय है वो असत्य है, अन्य शब्दों मे यदि आप किसी राज्य या देश काल परिस्थितियों मे अपने दर्शन को लेकर जीवन मे आगे बढ़ना चाहते हैं तो आगे बढ़ सकते हैं, और प्रतिरोध आपके दर्शन को और अधिक प्रौढ़ एवं शशक्त करने का ही कार्य करेंगे यदि वो इतने प्रबुद्ध हैं तो?

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यह लेख अभी एक प्रश्न के साथ अपूर्ण है, किन्तु सुझाव आमंत्रित हैं।  

क्या ‘मानव चरित्र एवं स्वभाव’ भाग्य जनित समस्या है?

जैसा कि हम जानते हैं के कर्म का एक विभाग भाग्य होता है, और इस भाग्य के साथ कई जन्मों की अवधारणा संलग्न है, यदि आप विज्ञान सम्मत उस चिंतन के अधीन होकर इस मत से जाने अनजाने में कुछ दूरी भी बना लें, जो विगत शताब्दियों मे प्रसिद्ध एक विज्ञानी, केवल एक विज्ञानी डार्विन के मतों से प्रभावित चिंतन है, तो भी आपको ‘विकास के सिद्धांत’ (Theory of evolution) के समकक्ष भौतिक द्वंद्वाद, या द्वंदात्मक भौतिकवाद के वशीभूत आने वाले भाग्य एवं सत्य पर निर्भर करना पड़ता है और ये भी कर्म आधारित भाग्य की एक दूसरी अवधारणा ही है, किन्तु इसमे फर्क सिर्फ और सिर्फ इतना ही है कि इस तरह के विज्ञान जनित भौतिकवादी चिंतन की सीमाएं केवल एक जन्म तक या ‘आप’ केवल एक ही बार जीते हैं और जीते जी जो कर्म करते हैं, उन्ही कर्मों की सीमाओं या अधिकार क्षेत्र मे आपके भाग्य या चरित्र की व्याख्या की जा सकती है और कुछेक रहस्यवादी या इसके समकक्ष मत परम्पराएँ भी आपके एक जीवन मे किए जाने वाले कर्मों से ही आपकी या आपके भाग्य की सात्यता को निर्धारित करने के प्रकल्प करते रहते हैं, इसके बरअक्स कुछ परम्पराएँ या मान्यताएं ऐसी भी हैं, जो मानव जीवन मे विकास के सिद्धांत की तमाम अवधारणाओं मे किसी ऐसे दखल से इंकार नही करती हैं जिसे रूह या आत्मन कहते हैं, रूह या आत्मन के सिद्धांत को मानने वाले इन मतों मे ही कहीं रहस्यवादी ज्योतिष भी या ज्योतिष विज्ञान भी समाता है, जो लोग विकास के सिद्धांत की ओर अधिक बल देकर अपने जीवन निर्वाह या भाग्य को प्राथमिकताएं प्रदान करते हैं, वे इस ज्योतिष को विगत शताब्दियों मे परंपरावादी हो गए या परंपरावादी व्यवहार कर रहे विज्ञान के सामने केवल एक ‘छद्म विज्ञान’ की परिकल्पना भर या विस्तृत विज्ञान की सीमाओं मे अभी न समा सकने वाला ऐसा ‘छद्म विज्ञान’ मानते हैं जो आज नही तो कल विज्ञान या तार्किक समाज द्वारा स्वीकार लिया जाएगा किन्तु तर्क के आभाव मे इसे अभी स्वीकार कर पाने मे वे लोग स्वयं को अक्षम पाते हैं, वैसे उनकी इस अक्षमता के पीछे जो तर्क है वो तर्क हम इस छंद मे समाहित कर चुके हैं।


आइए अब मानव चरित्र या स्वभाव की विचित्रता की ओर चलते हैं जिसका उत्तर परंपरावादी वैज्ञानिक चिंतक मनोविज्ञान की शाखाओं मे खोजते हैं, किन्तु जो लोग ज्योतिष का अध्ययन दशकों से तमाम या भिन्न दार्शनिक अवलंबों से कर रहें हैं वे लोग ये बात न केवल जानते हैं बल्कि ज्योतिष ज्ञान या इसमे समाहित रहस्य ज्ञान को जिसे द्वंदात्मक भौतिकवादी चमत्कार या ऐसी दुविधा कहते हैं जो अभी उनकी तर्क की सीमाओं मे नही समायी है किन्तु वे आनुवांशिक डीएनए या मानव डीएनए एवं मनोविज्ञान की शाखाओं मे इन प्रश्नों के उत्तर तलाश रहे हैं एवं संभवतः भविष्य मे वे ऐसे प्रश्नो को पूर्वजों के उत्तरोत्तर कर्मों से आए या प्राप्त हुए कोड के हवाले इस वृहद प्रश्न को कर अपनी पीएचडी या ज्ञान के क्षेत्र मे आने वाली अन्य उपाधियों से सम्मानित होकर जीवन यापन करते रहेंगे किन्तु मूल प्रश्न जस का तस ही बना रहेगा या मानव समाज कई सदियों तक केवल इन उपाधियों से उपजे ज्ञान को ही अंतिम सत्य के रूप मे स्वीकार कर अपनी दिन दैन्य गतिविधियों मे पूर्व की भांति ही संलग्नता प्राप्त कर्मों से अपने भाग्य को प्रगति देते रहेंगे, से इतर बहुत से ज्योतिष इसे पारेन्द्रिय अनुभवों की सीमाओं मे भी समझते हैं कि मानव चरित्र एवं मूल स्वभाव मे विचित्रता का राजकीय व्यवस्थाओं से या दार्शनिक परिवर्तनों के दशकों या कई दफ़े सहस्त्राब्दियों मे होने वाले परिवर्तन से कोई सीधा संबंध नही है, ऐसे संबंध केवल रूह या आत्मन पर पड़ने वाले तात्कालिक आलंबन या झुकाव मात्र हैं, दशकों के अध्ययन मे वे ये भी जान जाते हैं कि शायद ज्योतिष मे आने वाली मानव स्वभाव की व्याख्याएँ सीमित हैं एवं विकासमान या ग्रहों की प्रगति पथ की भांति ही ज्योतिष ज्ञान को अतिरिक्त अनुसंधान की भी आवश्यकता पड़ती है, और नयी व्याख्याएँ इसमे समाहित होती रहती हैं एवं पूर्व की व्याख्याओं मे सुधार परिवर्तन या कई दफ़े कुछ व्याख्याओं के त्याज्य की आवश्यकता भी बनी रहती है, किन्तु विज्ञान की ही भांति इसमे दृष्टि या दर्शन के वे मूल या आकाशीय तत्व बने रहते हैं जैसे स्वभाव की व्याख्या के लिए आकाश को विभाजित की जाने वाली गणना मे बहुत अधिक परिवर्तन कई सहस्त्राब्दियों तक भी न किया जाए तो जो गणना के लिए उपलब्ध नक्षत्र हैं उनको मद्देनजर रखते हुए जो विभाजन व्याख्याएँ पहले से मौजूद हैं वे सामान्यतः पर्याप्त हैं।


अभी तक इस लेख मे हम ये जान चुके हैं कि गूढ़ मानव स्वभाव की व्याख्या करने मे सक्षम ज्योतिष और ‘मनोविज्ञान की तमाम शाखाओं का समन्वय’ न्यूनाधिक दोनों ही मनोविज्ञान अपने प्रगति पथ पर अग्रसर हैं और कौन सा विषय अधिक सटीकता से व्याख्या कर सकता है ये पूर्णतः जिस व्यक्ति, वस्तु परिस्थिति या व्यक्ति समूह को व्याख्या की आवश्यकता है उसके सहज ज्ञान एवं उसे व्याख्या से प्राप्त स्वीकार्यता पर निर्भर करता है,अब ये स्वीकार्यता और सहज ज्ञान भी अपने आप मे एक वृहद विषय प्रश्न हैं, किन्तु अभी हम अपने मूल प्रश्न पर रहते हुए ही इस लेख मे आगे बढ़ेंगे कि मानव चरित्र या स्वभाव की विचित्रता को ज्योतिष मे कैसे देखा जा सकता है, ज्योतिष मे भी कई विधाएँ हैं जो मानव स्वभाव की विचित्रता एवं भाग्य की व्याख्या करने मे अपनी तरह से सक्षम हैं किन्तु दार्शनिक दृष्टि का आलंबन लेते हुए हम इसे उन विषयों की एकजुटता या गणना के उपरांत विभाजन तक सीमित रखते हुए केवल सत्ताईस या अट्ठाइस नक्षत्रों मे समाने वाली वे सभी व्याख्याएँ एवं ग्रह दृष्टियाँ, भाव दृष्टियाँ, ग्रह युतियाँ एवं इन संक्षिप्त से व्यापक विभाजन जैसे बारह राशियों मे समाहित मूल स्वभाव चरित्र व्याख्याओं को लेकर ही अभी यहाँ प्रतिबद्ध हैं, और एकाध दशकों मे इन व्याख्याओं के अध्ययन के उपरांत हमने ये पाया है के एक ‘देश काल परिस्थिति’ मे मानव स्वभाव की विचित्रता एवं विलक्षणता उस देश काल परिस्थिति मे व्याप्त राजकीय व्यवस्था न्यायिक व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से चलाने या बनाए रखने के लिए जिन सूचनाओं या अधिसूचनाओं पर निर्भर है वे सभी तात्कालिक ज्ञान या अधिकांशतः द्वंदात्मक भौतिकवाद से उपजे मनोविज्ञान पर निर्भरता लिए हुए है, ऐसे मे किसी भौतिक दृष्टि मे जो सही या गलत है उसकी व्याख्या ज्योतिष आदि विषयों मे पायी जाने वाली मानव स्वभाव की न्यायिक व्याख्याओं से इतर है।


अर्थात एक ज्योतिष एवं तमाम दर्शन आधारित व्याख्याओं की सीमाओं मे ज्योतिष पर दृष्टि रखने वाले साथ ही संशयवादी व्यक्तित्व को बनाए रखने वाले एक साधारण व्यक्ति की दृष्टि मे मानव स्वभाव पर आप नए अनुसंधान न्यायिक प्रणालियों मे सुधार एवं किसी भी राजनैतिक दर्शन के प्रभाव मे किए जा सकने वाले सभी वैधानिक बदलावों से भी मानव स्वभाव की विलक्षणता, विचित्रता एवं सात्यता या ‘कई संदर्भों की’ संभवतः ज्योतिष मे समाने वाले कुछ संदर्भों की दृष्टि मे जन्मों की धूर्तता, लोभ आदि को परिवर्तित करने मे अधिक सफलता प्राप्त नही कर सकते मानव स्वभाव मे कुछ गुण एवं आत्मिक मान्यताएं उन्हे फिर फिर कहीं न कहीं से प्राप्त हो ही जाएगी और रूह या आत्मन फिर फिर या पुनः वैसे ही व्यवहार का आचरण करती प्रतीत होगी, उदाहरण स्वरूप द्वंदात्मक भौतिकवाद की दृष्टि मे संभवतः आदिम काल के उपरांत जब भी सभ्यता का विकास हुआ तब से वेश्यावृत्तिः या इस तरह के स्वभाव के अपभ्रंश, व्यभिचार के तमाम प्रकार, दास प्रथाओं के तमाम प्रकार आज भी मौजूद हैं या आज भी तमाम ऐसी सांस्कृतिक विद्रूपताओं को मानव स्वभाव मे देखा जा सकता है जो बहुतों के लिए असहज किन्तु समाज के बहुत से वर्गों मे सहस्त्राब्दियों से स्वीकार्यता प्राप्त किए हुए है, इसी प्रकार तमाम सम्बन्धों, सह सम्बन्धों मे मिलने वाली विसंगतियों को भी आप सत्ताईस नक्षत्रों या बारह राशियों की सीमाओं मे देख सकते हैं। एक अन्य दृष्टि ये भी है कि जिसे आप विसंगति या विरोधाभास समझते हों वो किसी अन्य सामाजिक संकल्पना मे अत्याधिक मान्यता प्राप्त एक स्वीकार्य तथ्य या सत्य हो, अन्य शब्दों मे ज्योतिष मे व्यक्ति के स्वभाव की सीधी आलोचना के बजाय ये स्वीकारा जाता है के क्यों कोई व्यक्ति किसी काम मे निपुण है और किसी काम मे उसे सहजता प्राप्त करने मे अत्यंत श्रम अनुभव एवं अनुसंधान की सतत आवश्यकता बनी रहती है। कुल मिलाकर कोई भी प्रबुद्ध ज्योतिष राजकीय व्यवस्थाओं या ‘तमाम देश काल परिस्थितिजन्य’ संविधानों की सीमाओं मे मानवों या मानव स्वभावों के प्रति एकात्म दृष्टि का भाव रखते हैं वो एक ज्योतिष दृष्टि कभी स्वीकार नही कर सकती क्योंकि ज्योतिष दृष्टि जन मानस को एक मत या मताधिकारों की सीमाओं मे समाहित मत समूहों के खांचों मे बांधने की बजाय उन्हे दूसरी तरह के खाँचो या मनो विभागों मे विभाजित करके देखती है, हालांकि वो दृष्टि भी अपनी तरह से सम्यक दृष्टि है किन्तु एक प्रबुद्ध ज्योतिषविद के आगे एक सामान्य से दिखने वाले मानव के कई रहस्य उद्घाटित हो जाते हैं, और तब मामला धन के आधार पे, या बल के आधार पर या किसी भ्रम के आधार पे ज्योतिष की दृष्टि मे एक सत्य किन्तु किसी वैधानिक दृष्टि प्राप्त व्यक्ति की दृष्टि मे ऐसा असहज सत्य जिसे वो साम दाम दंड भेद आदि के माध्यम से झुठला देने का सामर्थ्य रखते हुए भी ज्योतिष के आगे वैसे ही झुठला नही सकता जैसे एक डाक्टर के आगे रोगी अपने रोग की सत्यता को झुठला नही सकता।

हो सकता है अभी तक इस लेख मे इन छंदो को दो या तीन बार पढ़ लेने के बावजूद आप इसके मर्म तक ना पहुंचे हों और पाठक अब तक लेख मे प्रयुक्त ‘शब्दावली'(Terminologies) जैसे ‘द्वंदात्मक भौतिकवाद’ जैसे शब्दों को प्रथम दृष्टिया आत्मसात न कर पाएँ हों, तो ऐसे मे इस लेख का एक हिस्सा या छंद निष्कर्ष के रूप मे लिखना अनिवार्य हो गया है। ये लेख मानव स्वभाव के बारे मे लेखक को संभव हुए अब तक के ज्ञान एवं तमाम दर्शन एवं मनोविज्ञान आदि एवं उन विषयों को यहाँ लिए गए मूल विषय ‘ज्योतिष’ मे एक प्रश्न को लेकर समाहित करता है, वो प्रश्न है, क्या जटिल मानव स्वभाव को किसी भी मनोविज्ञान संज्ञक विषय मे अब तक समाहित किया जा सका है या नही, तो लेखक इसका उत्तर इस लेख से देता है के संभवतः हाँ एक विषय है, ‘यदि आप चाहें’ (आपकी इच्छा सर्वथा स्वतंत्र है) तो ज्योतिष जैसे विषय का आलंबन ले सकते हैं, हालांकि इस विषय का आलंबन लेने के बाद भी आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, ‘आपकी देश काल परिस्तिथियाँ'(Your beliefs and geopolitical presence and it’s history) वो घटक तत्व हो सकते हैं जो आपको इस विषय पर आवश्यक आस्था बनाने से पहले घोर संशयग्रस्त किए रख सकते हैं, और उस तरह के संशय अपने आप मे एक वृहद लेख या नयी पुस्तकों को लिखने के लिए पर्याप्त प्रश्नो को समेटे हुए हो सकते हैं, ऐसे मे यदा कदा यहाँ वहाँ अपने जिज्ञासु मन को लेकर घूमने से पहले आप दुनिया मे किसी भी ज्योतिष विशेषज्ञ या कम से कम एक दशक के अनुभवी ज्योतिष से मिलकर अपने वे प्रश्न इस लेख को संदर्भ देकर अवश्य करें, अन्यथा देश काल परिस्तिथियाँ एवं आपकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मे पायी जाने वाली अनेक विसंगतियाँ आपको कई वर्षों तक भी घोर भ्रमित किए रख सकती हैं, संभवतः ऐसा इसलिए क्योंकि ये प्रश्न मानव जीवन के इतिहास मे न केवल दर्शन आदि विषयों एवं ज्योतिष आदि रहस्य विषयों के लिए भी सबसे बड़े उन अबूझ प्रश्नो की श्रेणी मे हैं, जिन्हे आवाम या जन सामान्य के लिए कदापि ‘सामान्यीकृत'(Generalized) नही किया जा सकता है, अर्थात ये व्यक्ति विशेष तक या उसकी विचित्रता तक सीमित रहने वाले निज धर्म या निज सत्य से जुड़ा ऐसा प्रश्न है, जिसे कोई गुरु महात्मा, पादरी, मौलवी, आदि इत्यादि भी कभी ‘सामान्यीकृत'(Generalized) नहीं कर पाए हैं और न ही ‘सामान्यीकृत'(Generalized) कर पाएंगे, ऐसे मे जिज्ञासु के लिए विशेषज्ञ परामर्श अत्यंत आवश्यक हो जाएगा। 

इसी क्रम मे यदि आप थोड़ा ध्यान दें तो पाएंगे कि लेखक ने इसे किसी जन सामान्य के लिए उपलब्ध पत्रिका या वैबसाइट आदि पर इसे नही छापा है, अपितु इसे केवल ज्योतिष विषय से संबंधित एक पुरानी या प्रबुद्ध वैबसाइट के माध्यम से ही आपके सम्मुख किया है, अर्थात ये केवल एक विषय से संबंधित रुचि वाले लोगों का ध्यान रखते हुए भी लिखा गया है, ऐसे मे यदि आप गाहे बगाहे इधर उधर से गुजरते हुए इसे अपनी राजनीतिक विषयों की रुचि मे समेटना चाहते हैं तो विषय का ज्ञानभाव आपको अवसाद ग्रस्त या पीड़ित कर सकता है। 

इस सूचना के अतिरिक्त एक बात और कि किसी विषय विशेष की दृष्टि मे, हजारों वर्षों के अवलोकन उपरांत एक सत्य संज्ञक ज्ञान प्राप्त होता है, और ऐसा सत्य तब तक सत्य ही रहता है जब तक वो किसी नए अनुसंधानपरक सत्य या तथ्यों के द्वारा खंडित न कर दिया जाए, फिर चाहे ऐसे अवलोकन आधारित सत्य या अनुभव लेखक, अनुसंधानकर्ता के अपने समाज, परिवार या किसी बेहद नज़दीकी, या किसी ऐसे व्यक्ति विशेष के जीवन अनुभव से होकर ही क्यों न गुजरा हो जो ऐसे अवलोकन या अनुसंधान मे प्रतिभागी रहे हों।
कई मर्तबा आप ये भी पाएंगे के ज्योतिष नजूमी आदि की श्रेणी मे आने या समाने वाले सभी सत्य या तथ्यों के प्रकार इन विषयों के लेखक पर भी कहीं बहुत नज़दीक से होकर गुजरे होते हैं, अर्थात चरित्र या स्वभाव मे बहुत से ऐसे तत्व हो सकते हैं जो न्यूनाधिक सब मे पाए जा सकते हैं किन्तु उन्हे नज़दीक से देखने का सामर्थ्य किन्ही कारणों से लेखक सहेज पाता है, फिर चाहे आप किसी सदी मे किसी देश काल परिस्थिति मे राजा, महाराजा, सम्राट, बादशाह, नेता, अभिनेता आदि इत्यादि कुछ भी रहे हों।
यदि आप सामान्य इतिहास भी पढ़ें तो ऐसे तमाम तथ्य अवश्य पाएंगे कि ‘चरित्र की शुभता, अशुभता, उच्चता या न्यूनता का इससे कोई भी लेना देना किसी भी समय नही रहा है कि आप कितने प्रबुद्ध, किसी विषय के विद्वान या कितने धनी, बली व्यक्ति हैं, या आप कितने बड़े घराने से तालुक्क रखते हैं, या आप किस ख़ानदान से हैं, या आप किस जाति समुदाय या धर्म से आते हैं, आपका जन्म जायज़ है या नाजायज़, आप किसी के वारिस हैं या फिर लावारिस हैं, बहुत दफ़े तो ऐसा देखने मे आता है के चारित्रिक समस्याएँ वहीं सबसे अधिक पायी जाती हैं जहां किसी तरह की कुलीनता या शालीनता की भ्रामक व्यवस्था हो इसके बरअक्स कई दफ़े मान्यताओं के विपरीत श्रेष्ठतम चरित्र वहाँ से निकलते देखे जाते हैं जो तथाकथित समाज की दृष्टि मे निम्नतर अपमानित एवं सर्वथा निंदनीय मानवीय जीवन की व्यवस्थाएं हैं, इसके पीछे केवल एक ही कारण दिखाई देता है और वो ज्योतिष मे छिपे वो रहस्य जो दर्शाते हैं कि ऊंचे घरानों या जायज़ ख़ानदान के बावजूद कोई जातक नए नाजायज़ समाज की रचना करने मे अग्रसर रहेगा और धन बल एवं ख़ानदान होने के बावजूद चारित्रिक न्यूनता की पराकाष्ठाओं को प्राप्त करेगा, हालांकि ऐसा भी देखने मे आता है कि किसी तरह का शक्ति समुच्चय आपके हाथ मे होने से पूरी दुनिया या वृहद समाज की भाग्य दिशाएँ इतिहास के किसी कालखंड मे निर्धारित हो सकती हैं, फिर भी आपके चरित्र या स्वभाव की ज्योतिष सत्यता जस की तस बनी रहेगी, जो किसी ‘चारित्रिक लकीर'(Scale for measuring character shades of individuals) के एक किनारे से दूसरे किनारे पर कहीं भी हो सकती है, और ऐसे पैमाने या लकीर आप अपने अपेक्षित समाज या मान्यताओं की सहूलियत मे नए सिरे से भी बना सकते हैं, किन्तु ज्योतिष मे इसे लेकर अपनी तरह की धारणाएं हैं, जो इस भाषा के मर्मज्ञ या सभी ज्योतिष विद स्वीकारते हैं, ऐसे मे जटिल मानव स्वभाव के बारे मे केवल कुछेक तथ्यों या ज्योतिषीय संकल्पनाओं के आधार पर किसी अनुमान पर स्वयं न पहुंचे, हो सके तो ऐसे विषयों पर मंथन के लिए किसी जानकार की सहायता लें, यदि चाहें तो हमें भी कमेंट बॉक्स मे जन्म तिथि, समय एवं जन्म स्थान आदि लिखकर भेज सकते हैं और सरसरी या सतही जानकारी संक्षेप मे भी प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु यदि निजता प्राथमिकता है तो आप हमे इस वैबसाइट के सोसल मीडिया या ईमेल के माध्यम से पत्राचार भी कर सकते हैं, आपके उत्तर उसी समय देना संभव नही होगा किन्तु समय मिलने पर उनका जवाब अवश्य लिखा जाएगा।

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इस लेख को संदर्भ करने वाले उद्धरण;       


‘साधना’ एक दार्शनिक एवं व्यापक संदर्भ शब्द

‘साधना’ हिन्दी, संस्कृत या भारत की वज्रयानी नामक बुद्धत्व की शाखा से जुड़ा हुआ एवं आज भी एक अत्यंत असीम संभावनाओं को लिए हुए शब्द है, जिसका पूर्ववर्ती प्रयोग सामान्यतः केवल धम्म, धर्म या एक सात्विक चिंतन प्रवाह को अधिक समय तक बनाए रखने के लिए किया जाता था, किन्तु पूर्व समय के कुछ लोग जीवनभर भी इस शब्द से मिलने वाले आत्मिक सम्मान या इस शब्द से स्वयं को अनन्य कारणों से ‘अभिभूत या मंत्रमुग्ध’ (Mesmerized) पाते थे, जिसमे तमाम भारतीय उप महाद्वीप के राज्यों, जनपदों के अंतर्गत आने वाले जनसामान्य से प्राप्त होने वाला स्नेह आदि एवं सहज ज्ञान की प्राप्ति की ओर उन्मुखता भी कुछ ऐसे कारक हैं जो इस बात की ओर दृढ़ता से बल देते हैं।

‘साधना’ का एक उद्देश्य आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षात्कार भी माना जा सकता है, अन्य शब्दों मे इस शब्द की सीमाओं मे बहुत कुछ ऐसा भी समाता है, जो संभवतः पूर्ण रुपेण सात्विक अभिलाषाओं को अपने मे समेटे हुए नही है, जैसे प्राचीन भारतीय मंत्र या विस्तारित अर्थों मे रहस्य विज्ञान की परिधि मे आने वाले वो कर्म जो किसी भी अर्थ मे सात्विक मनोभावों की ओर से जगे या उत्पन्न नही हुए हैं, जिन मनोभावों का प्रयोजन कभी रजोगुणी या सामान्यतः तमोगुणी इच्छाओं से लिया जा सकता है, अवश्य अब ‘साधना’ शब्द की असीमता का अंदाज़ा पाठकों को हो रहा होगा के जनसमूहों के कितने बड़े वर्ग या अन्य शब्दों मे सर्वांग जनसमूह को ही ये शब्द संबोधित कर रहा है। वर्तमान संदर्भों मे आपका संबंद्ध किसी भी ‘दर्शन'(Philosophies) धर्म, ‘विचारधारा'(Belief System) आदि से हो, किन्तु यदि आप किसी लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो आपकों उन लक्ष्यों की ओर उन्मुखता, चैतन्यता, या जागृत चिंतन के अतिरिक्त कुछ भौतिक अभौतिक साधनाओं की आवश्यकता पड़ सकती है, अब यदि आपका चिंतन या दर्शन निकृष्ट प्रवृतियों को लिए हुए है तो आप तमाम वैज्ञानिक, अवैज्ञानिक सात्विक पद्धतियों के अतिरिक्त कई बार उन साधना पथ पे अग्रसर या अग्रणी लोगों का सहारा ले सकते हैं, जो आपको तमाम निकृष्ट दुनियावी इच्छाओं की ओर शीघ्रता से लेकर जा सकता है या आपको ऐसी तात्कालिक संतुष्टि लाकर दे सकता है जिससे आप की न्यून चेतना के आयाम को कुछ समय ऐसा लग सकता है, के आप किसी प्रतियोगी अवस्था मे आगे हैं या आगे बढ़ रहें हैं, आपके पास दुनियावी धन के अंबार लग रहे हैं और आप तमाम सात्विक चिंतन की ओर अग्रणी ऋषि संज्ञक जीवित अजीवित आत्माओं से श्रेष्ठतर प्रदर्शन उन तमाम क्षेत्रों मे कर रहें हैं जिन क्षेत्रों मे उन लोगों का चिंतन कभी कभार या कभी नहीं जाता है, इसी प्रकार आप तमाम उन लोगों से भी बेहतर प्रदर्शन कर रहें हैं जो तमाम राजसी इच्छाओं मे अब तक अग्रणी रहें हैं, और ये सब केवल इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि आपकी स्वयं की साधना पद्धति या निकृष्ट अधम साधनाओं के मार्ग पे अग्रसर श्रेठ विद्वता ऐसा संभव किए दे रही है।

और ऐसे सब मनोभाव इसलिए सामाजिक स्वीकार्यता के केंद्र मे होते हैं, क्योंकि ये मानव जीवन की बहुत सी या तमाम बुनियादी आवश्यकताओं को केंद्र मे लिए होते हैं। अन्य शब्दों मे त्रिगुणों मे समा सकने वाले लगभग हर मनोभाव कामना या इच्छापूर्ति की संभावनाओं को ये शब्द अपने मे समेटे हुए है, अन्य शब्दों मे न तो ये शब्द सात्विक है न राजसिक न तामसिक बल्कि ये एक श्रेष्ठतम ‘त्रिगुणात्मक भाव शब्द’ है, यदि हम अपने आसपास की दुनिया पे एक सरसरी निगाह या सामान्य दृष्टि डालें तो हम पाएंगे के चारो ओर लगभग सभी लोग किसी न किसी वस्तु या वस्तुपरिस्तिथियों की प्राप्ति के लिए प्रतिबद्ध नज़र आ रहें हैं, किन्तु उन सभी मे जो बुनियादी भिन्नता या फर्क है, वो उनके साधना के प्रकार में है, इसे एक धर्म या दर्शन निरपेक्ष विचार से समझने का अतिरिक्त प्रयास इस तरह से करते हैं, कल्पना कीजिये एक बहुत प्रसिद्ध पहुंचे हुए फ़कीर की मज़ार पर बहुत से लोग मन्नत या दुआ मांगने के शृंखलाबद्ध प्रयासों को करते हैं, अब किसे मालूम के एक दिन या एक समय ऐसा आता है जब उनकी कुछ प्रमुख इच्छाएं या मनोकामनाएँ उनके अन्य क्षेत्रों मे दृढ़ संकल्प प्रयासों से या जाने अनजाने किसी अदृश्य शक्ति के द्वारा या अन्य शब्दों मे कहें के उस पहुंचे हुए फ़कीर की कृपादृष्टि या नजरों की रोशनी या आशनाई मे ये लोग अपनी इच्छाओं या महत्वकांक्षाओं के करीब पहुँच जाते हैं या करीब से होकर गुजरने का या कई सूरतों मे उन बातों को पा लेने का ही एहसास इन्हे छू लेता है, और ये इनके लिए चमत्कार सा है, किन्तु हमारे लिए ये दोनों ही सूरतें केवल ‘साधना’ के प्रकार मात्र हैं, एक व्यक्ति की इच्छा पूरा होना उसकी आध्यात्मिक या रहस्यमयी तरीके से कई समर्पित की गयी अन्य बहुत सी इच्छाओं को किसी दिव्यता से अभिभूत होकर उसे समर्पित करने या अपनी ओर से उन कम महत्वपूर्ण मनोकामनाओं को त्याग देने का भी फल हो सकता है।

जो कुछ भी हो चाहे ये वैज्ञानिक दृष्टि से देखिये या किसी रहस्यमयी अवैज्ञानिक या छ्द्मविज्ञान मे तर्क करने की महारत रखने वाले हम जैसे लेखकों की ओर इस श्रेष्ठतम प्रश्न को सरका दीजिये, जवाब एक ही मिलेगा वैज्ञानिक चिंतन इन तमाम कामना पूर्तियों को शृंखला प्रयासों या महत्वपूर्ण प्रयासों की शृंखला का नतीजा कहेगा, किन्तु सामान्यतः ‘संशयवादी'() एवं कभी कभी आस्तिक, अवैज्ञानिक या किसी रहस्यमयी हस्तक्षेप मे यकीन रखने वाले छद्मवैज्ञानिक चिंतन को रखने वाले हम जैसे बहुत से लोग इसे ऋषियों मनीषियों या किसी उसके लिए कभी कभी या एक साधना काल मे फ़ाका रखने वाले फ़कीरों से जोड़ कर भी देख सकते हैं, और ये सही है के ऐसी सभी दृष्टियाँ संभवतः अत्यंत अवैज्ञानिक चिंतन है फिर चाहे वो किसी सामान्यतः तर्कशील व्यक्ति के लिए क्षणिक चिंतन ही क्यों न हो। अब यहाँ तक इस शब्द के गहरे मर्म को छू या कुछ तरह से देख लेने के बाद इस शब्द के भविष्योनुमुखी क्षेत्रों को भी एक सरसरी निगाह से देखते चलते हैं, पूर्व की तरह भविष्य मे भी ये शब्द अपने सभी पुराने अर्थों को समेटे हुए रहेगा, किन्तु जो चिंतन तर्कशील है, किसी एक दर्शन या संप्रदाय मतधारा तक सीमित है, जिसके लिए साधना शब्द के मायने अब तक केवल एक या एकाध भारतीय दर्शनों तक सीमित रहें हैं, वो लोग ‘योग’ ‘योगाभ्यास’ जैसे एकाध चिंतन की दृष्टि मे किए जाने वाले शृंखला प्रयासों से इतर भी इस शब्द के विस्तीर्ण उपयोग से इंकार नही करेंगे।

जैसे ‘साधना’ लगभग सभी लक्ष्यों को साधने को लेकर देखा जाने वाला शब्द है, एवं ये पूर्व की न्यायीं बहुत से लोगों के लिए जिस प्रकार एक अत्यंत सात्विक या पवित्र शब्द रहा है, ये अब वैसा भी नही रहने वाला अर्थात इसके अन्यत्र बहुतेरे प्रयोग हैं, लेकिन स्मरण रहें ये लेख किसी के लिए इस शब्द का एक पर्दाफ़ाश भी हो सकता है, जो
किसी ‘साधना’ पथ पर अग्रसर व्यक्ति को केवल श्रेष्ठ एवं मानवता के लिए हितकारी महात्मा की संज्ञाओं मे ही अब तक समेटते आएं हैं, बहुत संभव हो के कई रहस्यमयी वैज्ञानिक अवैज्ञानिक अर्थात सब तरह की सिद्धियों को प्राप्त कर लेने वाले व्यक्ति के लिए स्वार्थ, भाई भतीजावाद या भाईचारे के हित ही उन सिद्धियों की दृष्टि मे सर्वोपरि हों, जैसे ही आपका चिंतन इस परिधि को पार करता है, आप स्वतः जान जाते हैं के दर्शन, धर्म, तमाम मत, एवं उनमे समा सकने वाली सब साधनाएं एवं तपस्याएं लगभग हर तरह के शृंखलाबद्ध प्रयास एवं आपके पूर्ववर्ती सिद्धों की तमाम सिद्धियाँ एवं उनको देने वाली सब रहस्यमयी ताक़तें लगभग सब या तो कूटनीति या भूराजनीति से भी प्रभावित रहती रही हैं। हमारी तरह वो रहस्यमयी शक्तियाँ भी सर्वथा संशय मे बनी रहती हैं, और फिर आपको ये भी लग सकता है के संभवतः यही सृष्टि को रचने वाला चाहता है के मनुष्य संशय मे ही बना रहे, या फिर आपको ये भी लग सकता है के हमारी रूह या आत्मा किसी अबूझ पहेली को सुलझाने के लिए ऐसे ही तब तक संघर्षरत बनी रहेगी जब तक उसे आत्म साक्षातकार न हो जाए, या फिर आपको तमाम रूहानी किताबों मे समाया हुआ ज्ञान अपने जीवन की दिशाओं के लिए एक संदर्भ लग सकता है।

जो भी हो जब तक आपको तमाम श्रेष्ठतम प्रश्नो के उत्तर नामालूम से हों, आप साधना शब्द का प्रयोग जैसे आपका मन चाहे वैसे करें, स्मरण रहे देश काल ‘परिस्तिथी'(अर्थात आपके संपर्क पद प्रतिष्ठा आदि) वो कारक सदा सर्वदा रहते हैं, जो आपकी साधना की ‘तीव्रता'(Intensity) अर्थात आपको किसी लक्ष्य को साधने के लिए ‘साधना को उपलब्ध समय’ स्थान या भूपरिस्तिथी एवं अपने गंतव्य या मूल स्थान से दूरी आदि वो कारक हैं जो आपकी साधना की दिशा एवं दशा तय कर सकते हैं, इसके अतिरिक्त कुछ साधनाएं ऐसी होती हैं, जो आप लोगों के सहयोग से अधिक तीव्र गति से प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु इसके विपरीत वो सहयोग आपको असहयोग भी महसूस हो सकता है यदि आपके व्यवहार और आपके द्वारा चुने गए सहयोगियों की इच्छाओं और साधनाओं के चुनाव मे ‘सामंजस्य'(Harmonious) या बहुत करीबी एकरूपता नही है, यहाँ ‘अंधे को अंधा रास्ता क्या बताए’ कहावत सटीक बैठती है, अन्य शब्दों मे ‘दूरदृष्टि या साधना लक्ष्यों को लेकर दूरअंदेशी'(Vision) होना अत्यंत आवश्यक है, कम से कम हरेक साधना लक्ष्य मे उस लक्ष्य के दूरअंदेशी विशेषज्ञ का होना भी आवश्यक है, दूरदृष्टि के बिना ये ऐसा है के जो खुद ही भटका हुआ है वह दूसरों का नेतृत्व क्या करेगा।

अब साधना शब्द के विस्तीर्ण संसार की इस अंतर्दृष्टि तक पहुँचने के बाद उन सभी या तमाम साधना मार्गी मनोभावों के पीछे जो मंतव्य आदि के अन्य कारक हैं जिनमे अपनी विचित्र दूरअंदेशी विलक्षणता से इतर उसे प्रभावित करने वाले नए पुराने ‘दायित्वों का बोध'(Sense of Obligations) एक अत्यंत या सबसे महत्वपूर्ण कारक है या हो सकता है, ऐसा इसलिए, क्योंकि आप कौन हैं?, आप कहाँ से आए हैं?, आपसे पूर्व वर्ती कौन कौन हैं?, आप किन्हे अपना गुरु मानते हैं?, आपकी शिक्षा दीक्षा आदि कहाँ से हुई है?, आपके शिष्य या भविष्य मे आपसे प्रभावित होने वाले साधक किन त्रिगुणों मे से एक का आधिक्य प्राप्त करते हैं?, आप दुनिया मे क्या छोड़ कर जाना चाहते हैं?, आप दुनिया से क्या क्या पाना चाहते हैं? ऐसे कई प्रश्न या जिज्ञासाओं की ‘संक्षिप्त आत्मिक सूची'(Brief Soul desires) या एक ‘व्यक्तिगत रूहानी फेहरिस्त'(Individual Soul desires) दायित्वों का बोध कहला सकती है।


ये लेख अभी अपूर्ण है, किन्तु कमेंट या सुझाव आमंत्रित हैं।

क्या हम ज्योतिष को केवल धर्म या परम्पराओं की दृष्टि से ही देख सकते हैं या?

क्या हम ज्योतिष को केवल धर्म या परम्पराओं की दृष्टि से ही देख सकते हैं या?

संभवतः ये एक महत्वपूर्ण प्रश्न है, क्योंकि ज्योतिष को ज्योतिष, नजूमी, एस्ट्रोलोजर आदि अनेक नामों से दुनिया मे जाना जाता है, और संभवतः दुनियाभर मे ज्योतिष आदि का इल्म रखने वाले सभी लोगों से वहाँ की परम्पराओं की रक्षा करने वाले या तथाकथित धार्मिक या परंपरावादी लोग ये उम्मीद जरूर रखते हैं कि उनसे पहले के या पुराने बुजुर्ग लोग जिन बातों पे तवक़्क़ो रखते थे उन बातों को ‘पंचांग’ (एक प्रकार के कैलेंडर) की दृष्टि से बताएं के अब के बरस या आने वाले वर्षों मे उन परम्पराओं की ‘तारीख’ (इतिहास) का संयोग आने वाले समय मे कैसे और कब होगा। अब क्योंकि समाज मे बहुत से और विषयों जिनमे से कई को विज्ञान मे सम्मिलित किया जा सकता है अन्य कई विषयों को सामाजिक ज्ञान के विषयों मे शामिल किया जा सकता है, किन्तु गणना की दृष्टियों मे खगोल भौतिकी से सम्बद्ध इस विषय को दुनिया भर मे पूरी तरह से विज्ञान सम्मत विषय के रूप मे इसलिए भी नही स्वीकारा जा सका है, क्योंकि संभवतः तमाम या भिन्न देश काल परिस्तिथियों मे ज्योतिष आदि विषयों का इल्म रखने वाले लोग इस विषय को अनुसंधान का विषय न मानकर अधिकांशतः इसे यथास्तिथी मे ही स्वीकार करते चले आते हैं और विषय को लेकर भविष्य की कोई रूपरेखा सामने नही आती अपितु विज्ञान सम्मत तरीकों से परीक्षण के आदी लोग इन विषयों पर कार्य अनुसंधान करने वाले लोगों की बातों, पत्रिकाओं मे छपे उनके वृहद लेखों को दरकिनार कर इन्हे छद्मविज्ञानी वर्ग मे धकेल देते हैं, अर्थात वे लोग जो विज्ञान सम्मत नियमों का सहारा लेकर तमाम तरह की भ्रांतियों को बनाते हैं या पहले से चली आ रही तथाकथित ‘प्राचीन'(Ancient) भ्रांतियों एवं विसंगतियों को बढ़ावा देते रहते हैं और विषयपरक ज्ञान एवं अनुसंधान से जितना संभव हो उतना बच कर ‘यथास्तिथीवाद'(Existentialism) या
अस्तित्ववाद को बनाए रखने मे अपना सहयोग चरम पर जाकर या चरमपंथी होकर करते हैं, अन्य शब्दों मे संभवतः इन्हे चरमपंथवादी मानकर इनसे मुख्य धारा की विज्ञान ने किनारा करने के लिए इन्हे ‘छद्मविज्ञानी’ (Pseudoscientist) वर्ग मे धकेला है। किसी भी नए ज्ञान को सीखने मे वक्त लगता है और उसी प्रकार किसी ज्ञान से जुड़ी विसंगतियों को जानने पहचानने मे भी वक्त लगता है, और इस तरह नया अनुसंधान दशको, शताब्दियों के काल खंडो मे अप्रचलित हो गयी विसंगतियों से दूरी बनाने के लिए विषय सुधारक अनुसंधानकर्ताओं की आवश्यकता बनी रहती है, अन्यथा वो जो अब तक प्रचलित है उस पर प्रश्न चिन्ह लगाए बिना एक यथास्तिथीवादी की भांति मानवता को प्रगति की ओर उन्मुख देखने वाले बहुत से लोगों की दृष्टियों से दूरी बनाए रखना नियति समकक्ष हो जाता है।

अपूर्ण लेख…. आगे भी जारी रहेगा।-/

ज्योतिष एवं स्वतंत्र इच्छा शक्ति

ज्योतिष का संबंध अनिवार्य से या आधारभूत से है। मनुष्य की जिज्ञासा उत्सुकता अधिक से अधिक अर्ध आधारभूत तक ही जाती है, मनुष्य खुशी खुशी या दुख की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त करेगा, उसका सम्बद्ध अनिवार्य या आधारभूत ज्योतिष से है। वो इमारत शीघ्र गिर सकती है या गिर जाएगी जिसके आधार गौण या अनावश्यक पर रखे गए हैं। जो कुछ भी व्यक्ति मनुष्य या वस्तुस्थितियों के जीवनकाल में अनिवार्य है और वो आधारभूत व्यक्ति मनुष्य समूह और वस्तुस्थितियों और सृष्टि की असीमता और अनंतता में लयबद्ध या अनुकंपी है। इस पूरे संसार या संसृति का एक हिस्सा मनुष्य व्यक्ति या वस्तुस्तिथियाँ हैं। अब तक इस संसृति मे जो कुछ भी घटित हुआ है। उसमे कोई मनुष्य अकेला नही है, सारी संसृति या संसार ही शामिल है। जो कुछ भी किसी एक वस्तु परिस्तिथी को घटित हो रहा है उसमे सम्पूर्ण संसार या संसृति का हस्तक्षेप है। जिस बिन्दु को ब्रहांन्ड संसृति की सभी शक्तियाँ छूकर गुजरती हैं, वहाँ एक व्यक्ति मनुष्य या वस्तुस्तिथी का निर्माण संभव हो जाता है।

आधारभूत या अनिवार्य ज्योतिष को इस प्रकार देखते हैं कि मनुष्य वस्तुस्थितियां पृथक नही बल्कि एकताल या एक तरह कि लयबद्दता में हैं। गौतम बुद्ध ने कहा जो हुए हैं उनसे भी हमे सहायता मिली है और जो अभी नही हुए हैं उनसे भी मुझे सहायता मिली है क्योंकि यदि वो भविष्य में न होंगे तो मैं आज वर्तमान में न हो सकूँगा, वर्तमान हो ही न सकेगा यदि भविष्य आगे न खड़ा हो। इस ब्रह्मांड का एक कायिक समुदाय या मूलभूत तत्व होना अनिवार्य या सारभूत ज्योतिष है।

किसी व्यक्ति का समृद्ध या विपन्न होना ज्योतिष से सम्बद्ध नही, यदि सब पहले से तय है तो समस्त ज्ञानार्जन अध्ययन अनुसंधान मूल्यहीन या महत्वहीन है। एक पाँव उठाने को व्यक्ति सर्वदा स्वतंत्र है, किन्तु एक पाँव उठाते ही दूसरा पाँव तत्क्षण बंधन प्राप्त होता है, पहले पाँव से सम्बद्ध होना मूलभूत का पर्याय है।

 वस्तुस्थितियों और मनुष्य की सीमाएं हैं सीमाओं के भीतर ही कुछ स्वेच्छा या स्वतंत्र संकल्प या इच्छा शक्ति विद्यमान है। चोरी करने के बाद तत्क्षण कर्म बंधन हो ही जाएगा किन्तु चौर्य कर्म करना या न करना स्वतंत्र संकल्पना स्वतंत्र इच्छा शक्ति है, जिसका चुनाव या इख्तियार सर्वदा उपलब्ध है। यदि ज्योतिष सही है तो संसृति या ब्रह्मांड सही है, और व्यक्ति या व्यक्तियों को उपलब्ध वस्तुस्थितियां नही। अनंत ब्रह्माण्ड संसृति की इच्छा संकल्प शक्ति का व्यक्ति वस्तु परिस्तिथियाँ एक हिस्सा हैं।

‘ज्योतिष’ पंचांग इतिहास पर्यवेक्षण प्रक्रिया भी

‘ज्योतिष’ पंचांग इतिहास पर्यवेक्षण प्रक्रिया भी

प्राचीन भारतीय मान्यताओं के अनुसार सम्राट कनिष्क के द्वारा बनवाया गया शक संवत सबसे प्राचीन उपलब्ध पंचांग है, शक संवत से पहले भी बहुत से पंचांग उस समय के समाज में प्रचलित थे, किन्तु तमाम तरह की अशुद्धियों के कारण ही संभवतः उन्हे बिसार दिया गया हो। कालांतर में शक संवत और एकाध अन्य पंचांगों से प्रेरणा प्राप्त विक्रम संवत पंचांग भी भारतीय मानस के अस्तित्व में आ गया।

जबकि पश्चिमी मान्यताओं के अनुसार ग्रेगोरियन कैलेंडर के अस्तित्व में आने का भी अपना ही एक विचित्र सा इतिहास है, पहली बार इटली के एक विद्वान ड़ाओनिसियस एक्सिगुअस के संरक्षण में ५२७ ई में एक ईसा कैलेंडर प्रचलन में आया इससे पूर्व पश्चिमी समाज में भी कई तरह की अशुद्धियों वाले सूर्य और चंद्र आधारित पंचांग या कैलेंडर मौजूद थे, जैसे ईसा पूर्व पहली सदी में जूलियस सीजर के शासन काल में ईसा पूर्व ४६ सन में ३६५ दिन को एक बार ४५५ दिन के वर्ष से पूर्व के पंचांग की अशुद्धियों को दूर करने का एक प्रयास दर्ज़ है, तदनुपरान्त जूलियस सीजर के शासन काल में दर्ज़ किए गए कई अन्य कैलेंडर सुधार भी दर्ज़ हैं जुलाई के माह का उसके नाम से जाना जाना भी उसके द्वारा किए गए सुधारों में से एक है।

जूलियस के बाद अगस्तस जिनके नाम से वर्तमान में प्रचलित अगस्त माह जाना जाता है, इस प्रकार हम देखते हैं कि रोम के दो शासकों जूलियस और अगस्तस ने पश्चिमी पंचांगों में उपयुक्त सुधार कर वर्तमान में प्रचलित कैलेंडर की आधारशिला रखी जो १५८२ के बाद पोप ग्रेगोरी नाम से अंतिम परिवर्तन को प्राप्त होने के बाद जो कैलेंडर वर्तमान में हमें उपलब्ध है वो प्रचलन में आया।

इस प्रकार हम पंचांग या कैलेंडर के संक्षिप्त इतिहास पर एक दृष्टिपात करते हुए ज्योतिष में प्रयोग होने वाले तमाम कैलेंडरों या पंचांगों की आरंभिक अशुद्धियों और कालांतर में आए महत्वपूर्ण परिवर्तनों से भी परिचित हो चुके हैं, मूलतः दुनिया में पाए जाने वाले सभी पंचांगों के मूल में आकाश में स्पष्ट दिखाई देने वाले प्रकाशमान तारों को ही आधारभूत स्तम्भ की तरह लिया गया है।

वर्तमान समय की दुनिया में सूर्य आधारित या चंद्र आधारित पंचांग ही अधिक प्रचलित हैं, जबकि भारत जैसे एकाध देशों में सूर्य और चंद्र आधारित संयुक्त पंचांग अधिक प्रचलित हैं, और दोनों को संयुक्त करने पर गणना में दिनों की संख्या आदि संभावित अशुद्धियाँ अधिक मास की संकल्पना या व्यवस्था से दूर कर लिया गया है।

इस प्रकार हम इस निष्कर्ष या तथ्य आदि पर स्वयं को पहुंचा हुआ मान सकते हैं कि जिस प्रकार प्राचीन आदिम समाज ने आकाश में प्रकाशमान और मानव आँखों से अवलोकित हो जाने वाले तारों को ऋतुओं महीनों या वर्षों की चक्रीयता में विभाजित पाया, आदिम समाज की खेती से जुड़ी मूलभूत आवश्यकताओं में भी ऋतुओं या मासों की चक्रीयता को सम्बद्ध पाया, और आवर्ती या तमाम चक्रीय घटनाओं के साथ ही प्राचीन आदिम समाज ने अपने पर्यवेक्षण में जहां जहां आवृति या चक्रीय प्रतिमान उन्हे कहीं कहीं किसी मानव जीवन के जन्म से लेकर मृत्यु तक भी दर्ज़ किया गया।

हम आदिम समाज या कालांतर में मानव समाज द्वारा महत्वपूर्ण व्यक्तियों समाजों के इतिहास के अवलोकन या पर्यवेक्षण को वर्तमान में प्रचलित तमाम इतिहास की किताबों में पढ़ते ही हैं, ठीक इसी तरह ज्योतिष के प्राचीन दस्तावेज़ भी इतिहास के दस्तावेज़ हैं। आवृतियों या पंचांग के द्वारा मानव जीवन में होने वाली किसी प्रकार की संभावित चक्रीयता की व्याख्या कर पाने में अक्षमता जब जब दृष्टिगत होती है, ज्योतिष के प्राचीन दस्तावेज़ और वर्तमान में बन रहे ज्योतिष एवं रहस्यवाद आदि की वृहद सीमाओं में आने वाले नए दस्तावेजों को छद्म ज्ञान विज्ञान की सीमाओं में समेटा जाना केवल मात्र संयोग नही बल्कि पर्याप्त अनुसंधान का आभाव मात्र है।

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‘उद्धरण’ (Citations)

नोट> इस लेख के कुछेक संदर्भ ‘साइन्स जरनी’ (Science Journey) नामक एक यू ट्यूब चैनल से उद्धृत हैं, एवं ज्योतिष को अंधविश्वास या छद्म ज्ञान कह खारिज करते हुए विज्ञान की प्रतिष्ठा में डॉ बेक्की के द्वारा की गयी एक टिप्पणी को मद्देनज़र हमें इस लेख शृंखला को लिखने की प्रेरणा प्राप्त हुई है।

मनुष्य सामान्यतः स्वयं को ही नही जानता है।

मनुष्य सामान्यतः स्वयं को नही जानता है, मनुष्य नहीं जानता है कि मूलतः वो कौन है अर्थात वह नही जानता कि स्वभावतः वह दुनिया में किसी परिस्थितिवश किस तरह का व्यवहार करेगा।

इसी तरह मनुष्य नहीं जानता कि किसी तरह के निश्चित भाव या संवेदनाएं उसके मनोमय कोश से कभी कहीं क्यों गुजरते हैं, किसी निश्चित या सुनिश्चित तरह के विचार या कल्पनाओं का साक्षी उसे क्यों होना पड़ता है? क्यों व्यक्ति किसी तरह की निर्णय प्रक्रियाओं से गुजरता है, क्यों किसी एक तरह या प्रतिरूपण निर्णयों को वो बार बार प्राप्त होता है? मनुष्य मूल रूप से स्वयं के लिए भी एक रहस्य के समान स्वयं को बना हुआ पाता है। इसी क्रम में व्यक्ति से आगे परिवार निकट संबंधी एवं अपने करीब या आस पड़ोस के वातावरण के बारे में भी इसी तरह का मुगालता बना रहता है कि वो उनमे से बहुत से व्यक्तियों या वस्तु परिस्थितियों का भली प्रकार से अंदाज़ा लगा सकता है, किन्तु अधिकांशतः ऐसा नही होता और वो वहाँ भी स्वयं को भ्रमित ही पाता है और सामान्यतः अपने ही मनोभावों को उनपर आरोपित करने के इलावा उसके समक्ष और कुछ ऐसा नही होता जिससे वो पूर्णरुपेण ये दावा कर सके के वो अपने आस पास के वातावरण या व्यक्ति वस्तु परिस्तिथियों को ऐसे जान पाया है जैसे वो मूल रूप से व्यवहार करने को बाध्य हैं। मनुष्य आमतौर से अपने ही दिमाग या मनोमय कोश में स्वयं को कैद पाता है, वो उन लोगों के मूल स्वभाव को नही जान पाता है जिनके साथ उसका वास्ता पड़ता है। इसी तरह अपने निकट संबंधियों और आस पड़ोस से आगे जब वो किसी दूसरे अपरिचित माहौल में स्वयं को पाता है, तो वो वहाँ के लोगों की एक भिन्न तरह की भाषा शैली या संस्कृति को समझने के साथ ही उनमे से अधिकांश लोगों के मूल स्वभाव को जानने की एक उत्कंठा स्वयं मे पाता है, किन्तु केवल उत्कंठा या जिज्ञासा मात्र से भी वो नए वातावरण को सही तरह से डिकोड कर पाने में सामान्यतः स्वयं को असमर्थ ही पाता है। क्योंकि मनुष्य आमतौर से स्वयं को ऐसे ही हालातों या माहौल में स्वयं को बार बार पाता है जहां वो  ये नही समझ पाता है कि क्यों उसके निर्णय वातावरण या वस्तु परिस्थितियों से भिन्न प्रकट हो जाते हैं या वो निर्णय प्रक्रिया में भूलें कर बैठता है।

कुलमिलाकर मनुष्य बाहरी आवरण या बाहरी जानकारी के अनुसार अपनी निर्णय प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देने की जल्दी कर ही बैठता है और इस तीव्रता के कारण प्रकट होती हैं नयी वस्तु परिस्थितियाँ जिनसे न केवल वह स्वयं प्रभावित होने के लिए अभिशप्त है बल्कि कई बार भविष्य में पड़ने वाले इन संभावित प्रभावों का दायरा या विस्तार मनुष्य की चिर परिचित वस्तु परिस्थितियों या व्यक्तियों की संक्षिप्त दुनिया से बहुत व्यापक हो जाता है। ऐसे में नित नए हालातों या नित नयी होती दुनिया में किसी व्यक्ति के मूल स्वभाव या संभावित मूल स्वभाव को जानने से मनुष्य की निर्णय प्रक्रियाओं में यदि सभी नही तो बहुत सी भूलों से बचा जा सकता है, और यदि कोई सामान्य गलती करने वाले व्यक्ति के सामान्य दिन दैन्य में केवल संभावित भूलों को कम ही किया जा सके तो ये न केवल उस व्यक्ति के लिए अपितु किन्ही परिस्थितियों में महत्वपूर्ण निर्णय लेने वाले व्यक्तियों के माध्यम से बहुत व्यपाक स्तर पर किन्ही अति सामान्य भूलों या चूकों की प्रभाव क्षमता से उपजने वाले संभावित संकटों से बचा जा सकता है।

स्मरण रहे एक लेखक के रूप में इस लेख को लिखते हुए भविष्य में सूचना प्रौद्योगिकी से उपजने वाली लगभग सभी तरह लाभ हानियों को समेटते हुए इस लेख को साकार रूप दिया जा रहा है, अर्थात इस लेख को लिखते हुए “ऐ आई, ए आर, वी आर, आदि”(#Ai, #Ar #Vr etc) की सीमाओं में होने वाली भूलों को भी इसमे समेट लिया गया है। एवं इस लेख को पढ़ने वाले स्वयं को इस भ्रम से अवश्य बचाएं कि वो व्यक्ति के मूल स्वभाव एवं वस्तु परिस्थितियों को जानने से जुड़ी जिज्ञासाओं को केवल किसी प्रौद्योगिकी की सहायता से ऐसे हल कर पाने मे सक्षम होंगे कि व्यापक स्तर पर किन्ही भूलों के प्रसार या प्रभाव को रोका जा सके, नही ऐसा नही है! अपितु इन प्रोद्योगिकीयों के कारण किन्ही सामान्य भूलों की तीव्रता में केवल गुणात्मक वृद्धि को ही सभी पक्ष महसूस करेंगे। ऐसे में मूल स्वभाव को जानने वाले रहस्यमयी अनुसंधान एवं ज्योतिष आदि  की सीमाओं में आने वाले ज्ञान की आवश्यकता को भविष्य में भी नकारा नही जा सकता है।

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